चुपके चुपके उस जॉनर की फ़िल्मों की बेहतरीन मिसाल है, जिसमें कॉमेडी है लेकिन ये न फूहड़ है, न इसमें डबल मीनिंग डायलॉग हैं. फ़िल्म जिसमें हँसी के फ़ुव्वारे और सादगी है.
गुलज़ार के स्क्रीनप्ले वाली इस फ़िल्म की कहानी साधारण-सी है. बॉटनी के प्रोफ़ेसर परिमल त्रिपाठी (धर्मेंद्र) और बॉटनी की छात्रा सुलेखा (शर्मिला टैगोर) की शादी हो जाती है.
शर्मिला की बहन और जीजा जी उस शादी में शामिल नहीं हो पाते हैं.
शादी के बाद धर्मेंद्र को पता चलता है कि शर्मिला अपने ‘जीनियस जीजा’ जी यानी ओमप्रकाश को बहुत ज़्यादा मानती हैं.
मज़ाक मज़ाक में धर्मेंद्र तय करते हैं कि वो अपनी पत्नी को दिखाएंगे कि जीजा जी (ओम प्रकाश) इतने भी जीनियस नहीं हैं.
जीजा जी के साथ इस खेल में ज़रिया बनती है भाषा, क्योंकि ओम प्रकाश हिंदी के इस्तेमाल को लेकर कुछ ज़्यादा ही संजीदा हैं और उन्हें हिंदी बोलने वाला इलाहाबादी ड्राइवर ही चाहिए.
धर्मेंद्र यानी प्रोफ़ेसर परिमल त्रिपाठी, जीजा जी (ओमप्रकाश) के यहाँ ड्राइवर प्यारे मोहन बनकर चले जाते हैं और यहीं से सब गोलमाल शुरू होता है.
जल्द ही ड्राइवर प्यारे मोहन यानी प्रोफ़ेसर त्रिपाठी (धर्मेंद्र) अपनी शुद्ध हिंदी से पहले तो ओमप्रकाश को प्रभावित करते हैं और बाद में ओम प्रकाश इसी बात से परेशान हो जाते हैं.
अंग्रेज़ी की भी ऐसी नुक्ता चीनी करते हैं कि ओमप्रकाश को भी जवाब नहीं सूझता.
मसलन ड्राइवर बने धर्मेंद्र ओमप्रकाश से कहते हैं, ‘अंग्रेज़ी बहुत ही अवैज्ञानिक भाषा है साहेब. सीयूटी कट है पर पीयूटी पुट है. टीओ टू, डीओ डू ,पर जीओ गो हो जाता है. जीओ गू क्यों नहीं होता?’
हिंदी और अंग्रेज़ी के चुनिंदा शब्दों और वाक्यों को समेटकर उन्हें चुटीले अंदाज़ में फ़िल्म में समाहित करना गुलज़ार का कमाल था.