चुपके चुपके की कॉमेडी का जादू 50 साल बाद भी बरक़रार

बतौर अभिनेता धर्मेंद्र का ये डायलॉग याद है आपको, “किसी भी भाषा का मज़ाक उड़ाना घटियापन है और मैं वही कर रहा हूँ.”

फिर डेविड का वो जवाब, “अरे बरख़ुर्दार तुम भाषा का मज़ाक नहीं कर रहे हो. एक आदमी का मज़ाक कर रहे हो. भाषा अपने आप में इतनी महान होती है कि उसका मज़ाक किया ही नहीं जा सकता.”

अपने आप में ये वाक्य काफ़ी गंभीर सुनाई पड़ता है, लेकिन जब आप धर्मेंद्र और डेविड के बीच इस डायलॉग को ऋषिकेश मुखर्जी की फ़िल्म ‘चुपके चुपके’ में सुनते हैं तो न सिर्फ़ ये डायलॉग बल्कि पूरी फ़िल्म ही आपको हंसाती है.

चुपके चुपके 50 साल पहले 11 अप्रैल 1975 में रिलीज़ हुई थी. इसे आज भी क्लासिक फ़िल्मों में गिना जाता है, तो इसकी कुछ वजहें हैं.

भाषा के इर्द गिर्द बनी इस फ़िल्म में शुद्ध हिंदी बोलने का नाटक करने वाले धर्मेंद्र के संवाद कमाल के हैं.

धर्मेंद्र ख़ुद को ड्राइवर नहीं वाहन चालक बताते हैं, ट्रेन को लौह पथ गामिनी बोलते हैं. यहां तक कहते हैं कि भोजन तो हमने लौह पथ गामिनी स्थल पर ही कर लिया था.

जब हाथ धोने होते हैं, तो कहते हैं कि ‘मैं हस्त प्रक्षालन करके आता हूँ.’

बात-बात में कहते हैं कि हिंदी बोलते समय हम अंग्रेज़ी शब्दों का प्रयोग उचित नहीं समझते.

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